ADVERTISMENT

मंगलवार, 28 जनवरी 2025

अमौसा के मेला

 अमौसा के मेला


भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा।
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा।

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा।
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू।

आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ,
हँसत हउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ।
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा?

एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी,
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी।
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी,
नयका चपलवा अचारे का ओरी।

(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ.
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री‍-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ

चपायल ह केहु, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू.
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे जीरा के नियर.

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया.
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,

छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा.
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.

रविवार, 26 जनवरी 2025

गणतंत्र दिवस: राष्ट्र निर्माण और स्वर्णिम भविष्य का महापर्व

गणतंत्र दिवस राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का पर्व है और देश का स्वर्णिम भविष्य गढ़ने का अवसर। यह एक राष्ट्रीय महायज्ञ है जिसमें हर नागरिक को अपनी योग्यता एवं सामर्थ्य के अनुसार आहुति देनी है। सत्कर्तव्य की यह आहुति न केवल आत्मिक सुख प्रदान करेगी, अपितु राष्ट्र को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठापित भी करेगी। "वयं राष्ट्र जागृयाम", यजुर्वेद के इस मंत्र के साथ यह पर्व जनमानस को जागृत कर राष्ट्रभक्ति के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रभक्ति ईश्वर की नवधा भक्ति से कम नहीं होती। अतः मन, वाणी एवं कर्म से हमारा समग्र चिंतन राष्ट्र को समर्पित होना चाहिए।

राष्ट्रभक्ति उस जापानी नागरिक से सीखी जा सकती है, जो रेलयात्रा के दौरान स्टेशन पर फल न देखकर भारतीय संत स्वामी रामतीर्थ के मुख से "शायद इस देश में फल नहीं होते", यह सुनकर अगले ही पल फलों की टोकरी के साथ उनके समक्ष उपस्थित हो जाता है। जब मूल्य पूछा तो विनत भाव से बोला "श्रीमन्! फल स्वीकार कीजिए। यदि मूल्य देना है तो अपने देश में जाकर किसी से मत कहना कि जापान में फल नहीं होते"। जिस देश के नागरिकों में ऐसी राष्ट्रभक्ति हो, वहां के गणतंत्र को कोई खतरा-नहीं हो सकता। गणतंत्र की सफलता एवं देश के स्वाभिमान की रक्षा नागरिकों की उच्च चिंतन दृष्टि से होती है।

गणतंत्र दिवस संविधान की अभ्यर्चना का पर्व है और योगक्षेम की प्राप्ति का साधन। जब विधान के बिना जीवन का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता तो राष्ट्र का कैसे हो सकता है? सामाजिक स्वतंत्रता, समानता तथा न्याय का सशक्त आधार होने से ही किसी गणतंत्र की रीढ़ मजबूत होती है। इसके बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी तथा देश का विकास पंगु हो जाता है। गणतंत्र को चिरंजीवी बनाने वाला राष्ट्रीय एकता का एकमात्र साधन यही है।

गुरुवार, 16 जनवरी 2025

कौन हैं IITian बाबा? महाकुंभ की कहानी।

 IITian बाबा: लाखों की नौकरी छोड़ अध्यात्म की ओर बढ़ने की प्रेरणादायक कहानी



महाकुंभ 2025 के दौरान कई साधु-संत और तपस्वी अपने अनोखे कार्यों से सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन इनमें सबसे अधिक चर्चा में हैं "IITian बाबा"। इस बाबा का असली नाम अभय सिंह है, जिन्होंने IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद लाखों की नौकरी छोड़कर अध्यात्म का रास्ता चुना। उनकी इस अनोखी यात्रा ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।

कौन हैं IITian बाबा?

हरियाणा के झज्जर जिले के सासरौली गांव के रहने वाले अभय सिंह ने IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। अपनी उच्च शिक्षा और बेहतरीन करियर के बावजूद, उन्होंने अपने जीवन में एक बड़ा बदलाव करने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि वे कई प्रतिष्ठित कंपनियों में काम कर चुके हैं, और कनाडा में भी तीन साल तक रहकर एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी की।

लाखों की नौकरी छोड़कर अध्यात्म की ओर

अभय सिंह ने बताया कि कनाडा में वे 3 लाख रुपये मासिक वेतन यानी 36 लाख रुपये सालाना के पैकेज पर काम कर रहे थे। हालांकि, वहां की जिंदगी और काम से वे निराश और तनावग्रस्त रहने लगे। उन्होंने महसूस किया कि भौतिक सुख-सुविधाओं से उनका मन भरा नहीं, बल्कि वे और अधिक मानसिक तनाव में आ गए। इसी निराशा से उबरने के लिए उन्होंने अध्यात्म का रास्ता चुना।

मेंटल हेल्थ और अध्यात्म

अभय ने बताया कि कनाडा में रहने के दौरान वे डिप्रेशन से जूझ रहे थे। उन्होंने मेंटल हेल्थ समस्याओं से निपटने के लिए अध्यात्म की ओर रुख किया, जिसने उन्हें शांति और आत्मिक संतोष प्रदान किया। अध्यात्म में उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान मिला और उन्होंने अपने जीवन में एक नई दिशा की खोज की।

व्यक्तिगत जीवन और 4 साल की डेटिंग

अभय सिंह ने यह भी बताया कि वे भारत में एक लड़की के साथ चार साल तक रिलेशनशिप में थे। हालांकि, अपने माता-पिता के बीच विवादों के कारण उनका शादी से विश्वास उठ गया और उन्होंने विवाह नहीं करने का निर्णय लिया। इस व्यक्तिगत अनुभव ने भी उनके जीवन में बदलाव लाने में भूमिका निभाई।

परिवार की प्रतिक्रिया

अभय के पिता, कर्ण सिंह, जो पेशे से वकील हैं, ने बताया कि अभय ने पिछले छह महीनों से उनके संपर्क में नहीं थे। उन्होंने कहा कि अभय कनाडा में अपनी बहन के साथ रहते थे और वहां नौकरी कर रहे थे। परिवार के लिए अभय का यह निर्णय अप्रत्याशित था, लेकिन वे उनके इस फैसले का सम्मान करते हैं।

IITian बाबा की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है जो भौतिक सुख-सुविधाओं और उच्च वेतन के बावजूद अपने जीवन में आत्मिक संतोष की खोज में हैं। अभय सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण है कि असली खुशी और संतोष बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि भीतर की शांति में है। उनकी यह यात्रा न केवल अध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए, बल्कि आधुनिक युग में मानसिक स्वास्थ्य और आत्मिक संतोष की तलाश में लगे लोगों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत है।


सैफ अली खान पर हमला

 सैफ अली खान के घर पर हमला: बांद्रा स्थित अपार्टमेंट में अज्ञात शख्स ने किया हमला



बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान के बांद्रा स्थित घर में बुधवार देर रात एक अज्ञात शख्स ने हमला कर दिया। इस हमले में सैफ अली खान घायल हो गए, जिसके बाद उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस की शुरुआती जांच के अनुसार, यह घटना देर रात करीब 2.30 बजे घटी, जब एक अज्ञात व्यक्ति चोरी के इरादे से उनके घर में घुस आया। सैफ अली खान की पत्नी करीना कपूर खान और उनके बच्चे तैमूर और जेह भी इस घर में रहते हैं।

घटना का विवरण

सूत्रों के मुताबिक, घर में घुसे शख्स की बहस सैफ अली खान की मेड से हो रही थी। जब सैफ ने बीच-बचाव की कोशिश की, तो हमलावर ने उन पर चाकू से हमला कर दिया। घटना के समय परिवार के अन्य सदस्य भी घर में मौजूद थे। इस हमले में सैफ के हाथ, रीढ़ की हड्डी और गर्दन पर चोटें आईं। खबरों की मानें तो सैफ का ऑपरेशन हो चुका है और उनकी स्थिति खतरे से बाहर है। डॉक्टरों ने उनके घावों से तीन इंच की नुकीली चीज निकाली है और कॉस्मेटिक सर्जरी भी की जा रही है।

पुलिस की कार्रवाई

बांद्रा पुलिस ने घटना की सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की। बांद्रा के डीसीपी ने बताया कि अज्ञात शख्स के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है और जांच जारी है। स्क्वायड डॉग्स को भी अपार्टमेंट में जांच के लिए लाया गया है। पुलिस फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हमलावर का मकसद क्या था और वह कैसे घर में दाखिल हुआ।

सैफ अली खान की स्थिति

लीलावती अस्पताल में भर्ती सैफ अली खान का ऑपरेशन चल रहा है। उनकी पत्नी करीना कपूर खान भी उनसे मिलने सुबह 4.30 बजे अस्पताल पहुंचीं। करीना की टीम ने बयान जारी कर कहा है कि घर में अब सब कुछ ठीक है और सैफ की हालत स्थिर है।

सैफ अली खान का बांद्रा वाला घर

सैफ अली खान का बांद्रा में स्थित घर सतगुरु शरण बिल्डिंग में है, जो एक शानदार 3 बेडरूम अपार्टमेंट है। इसमें छत, बालकनी और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। यह घर सैफ, करीना और उनके बच्चों के लिए एक आरामदायक और आलीशान निवास है।

फिल्म की शूटिंग स्थगित

इस हमले के बाद, सैफ अली खान की आगामी फिल्म की शूटिंग को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। पहले ही अभिनेता जयदीप अहलावत के पिता के निधन के कारण शूटिंग रुकी हुई थी, और अब सैफ के घायल होने के बाद शूटिंग में और देरी हो सकती है।

यह घटना बॉलीवुड के लिए एक बड़ी खबर है, जिसने प्रशंसकों और इंडस्ट्री को झकझोर कर रख दिया है। सैफ अली खान पर हुए इस हमले की जांच जारी है, और उनकी सेहत को लेकर उनके फैंस चिंतित हैं। सैफ की सुरक्षा को लेकर उठाए जाने वाले कदमों पर भी नजर बनी हुई है।

सैफ अली खान की इस घटना से जुड़ी ताजा खबरों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।.

कौन हैं हर्षा रिचारिया? ग्लैमर से भक्ति की ओर

 महाकुंभ 2025: प्रयागराज में हर्षा रिछारिया का आकर्षण, ग्लैमर से भक्ति की ओर


प्रयागराज में महाकुंभ 2025 का शुभारंभ 13 जनवरी से हुआ, जहां शुरुआती दो दिनों में ही लगभग 4 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई। हर कोने से श्रद्धालु इस धार्मिक मेले में पुण्य कमाने के लिए उमड़ रहे हैं। इस महाकुंभ में एक नाम, जो इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है, वह है हर्षा रिछारिया। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं और उन्हें "प्रयागराज महाकुंभ की सबसे सुंदर साध्वी" कहा जा रहा है।

कौन हैं हर्षा रिछारिया?



31 वर्षीय हर्षा रिछारिया उत्तराखंड से आती हैं, जबकि उनका मूल घर मध्य प्रदेश के भोपाल में है। वे आचार्य महामंडलेश्वर की शिष्या हैं और निरंजनी अखाड़े से जुड़ी हुई हैं, जो नागा साधुओं के लिए प्रसिद्ध है। हर्षा ने अपने इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर खुद को एंकर, मेकअप आर्टिस्ट, सोशल एक्टिविस्ट, सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर, और ट्रैवल ब्लॉगर के रूप में प्रस्तुत किया है। अपने पिछले जीवन में वे एक जानी-मानी एंकर रही हैं और बाद में एक सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर के रूप में लोकप्रियता पाई।

साध्वी कहलाना पसंद नहीं

हर्षा रिछारिया की महाकुंभ में उपस्थिति ने उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया है, लेकिन वे खुद को साध्वी कहलाना पसंद नहीं करतीं। उन्होंने स्पष्ट किया, "आप मुझे हर्षा ही कहिए। महाकुंभ में आते ही मुझे साध्वी का टैग दे दिया गया है, जो फिलहाल सही नहीं है। मैं कोई साध्वी नहीं हूं। मैंने साध्वी के लिए कोई दीक्षा नहीं ली है और मेरा कोई संस्कार भी नहीं हुआ है। मैं एक साधारण शिष्या हूं, जिसने बस गुरु मंत्र लिया है और साधना कर रही हूं।"

भक्ति और ग्लैमर का अनूठा समन्वय

हर्षा रिछारिया ने ग्लैमर वर्ल्ड छोड़कर आध्यात्म की राह चुनी है। वे मानती हैं कि भक्ति और ग्लैमर में कोई विरोधाभास नहीं है। उनकी पुरानी तस्वीरें अब भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं, जिसे वे हटाना नहीं चाहतीं। उनका कहना है कि यह उनकी जिंदगी का हिस्सा है और अब वे एक नई यात्रा पर हैं। हर्षा का यह सफर उनके पुराने और नए जीवन के बीच एक संतुलन का प्रतीक है, जो भक्ति और आधुनिकता के मेल को दर्शाता है।

महाकुंभ में हर्षा रिछारिया का सफर

महाकुंभ 2025 में हर्षा रिछारिया का सफर एक आध्यात्मिक यात्रा है, जो उन्हें एक नई पहचान दिला रहा है। सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति और वायरल हो रही तस्वीरें उन्हें एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व बनाती हैं।

निष्कर्ष

हर्षा रिछारिया का जीवन एक प्रेरणा है कि ग्लैमर और भक्ति का संगम कैसे संभव है। प्रयागराज महाकुंभ में उनकी उपस्थिति ने उन्हें एक चर्चित हस्ती बना दिया है, जो भक्ति और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ते कदमों की कहानी कहती है।

महाकुंभ 2025 से जुड़ी हर खास खबर और अपडेट के लिए हमारे साथ बने रहें।

शनिवार, 11 जनवरी 2025

HMPV वायरस क्या है?

HMPV वायरस क्या है?

HMPV (Human Metapneumovirus) एक वायरस है जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। यह वायरस खासकर छोटे बच्चों, बुजुर्गों, और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में श्वसन संक्रमण का कारण बन सकता है।

HMPV के लक्षण:

  • सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण (नाक बहना, गले में खराश)

  • खांसी

  • बुखार

  • सांस लेने में कठिनाई (गंभीर मामलों में)

  • ब्रोंकाइटिस या निमोनिया (कभी-कभी)

HMPV संक्रमण के तरीके:

  • यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या संपर्क में आने से फैलता है।

  • यह सतहों पर भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है, जिससे संक्रमण फैल सकता है।

इलाज:

HMPV के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा नहीं है। उपचार लक्षणों को कम करने पर केंद्रित होता है, जैसे:

  • बुखार कम करने के लिए पेरासिटामोल

  • हाइड्रेशन बनाए रखना

  • गंभीर मामलों में ऑक्सीजन थेरेपी या अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता हो सकती है।

बचाव:

  • हाथों की नियमित सफाई

  • संक्रमित व्यक्तियों से दूरी बनाए रखना

  • श्वसन शिष्टाचार का पालन (छींकते या खांसते समय मुंह ढंकना)

HMPV आमतौर पर सर्दियों के महीनों में अधिक फैलता है। बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभाल इस वायरस के प्रसार को रोकने में मदद कर सकती है।

आप इस से बहुत ज़्यादा परेशान न हो, आप इसका पता चले या कुछ महसूस हो तो बचाव करें घबराए नहीं।

धन्यवाद!👍


मंगलवार, 7 जनवरी 2025

पिता

                              पिता

मैं आज कुछ पंक्तिया पिता पर निवेदित करने जा रहा हूँ जब पूरा ब्रह्माण्ड उद्गोष करता है तो माँ जन्म लेती है परंतु ये भी कहने में अतिशयोक्ति न होंगी की पिता सृष्टि में निर्माण कि अभिव्यक्ति है।
 बहुत लोग कहते है कि भगवान है तो सब कुछ है और सब कुछ हो जाएगा।
पर मेरा मानना है कि भगवान का ही दूसरा रूप धरती पर पिता का है जो अपने बच्चों को कभी किसी चीज़ की कमी महसूस तक न होने देता है।
भले ही उस पर कितनी ही विपत्तियों का पहाड़ ही क्यो न टूट पड़ा हो।
 पिता अपनी इच्छाओं का हनन व परिवार की पूर्ति है।

गुरुवार, 19 मई 2022

कभी-कभी

कभी-कभी खुद पर मर जाने का मन करता है,
और कभी अपने ही गमों से बातें का मन करता है,

कभी-कभी अपनी हँसी पर रूठ जाने का मन करता है
और कभी पूरे जग को हँसाने का मन करता है,

कभी-कभी लाख गमों पर भी आँसू नहीं आते 
और कभी बेवजह आँसू बहाने का मन करता है,

कभी-कभी अपनों से दूर जाने का मन करता है
और कभी किसी के बाहों में समा जाने का मन करता है,

कभी-कभी खुद से रूठ जाने का मन करता है
और कभी उसकी सासों में समा जाने का मन करता है।




मंगलवार, 10 मई 2022

कविता

 यार बड़े पछताओगे
जो बीत गया उसे कभी वापस न ला पाओगे
जो दिल में प्रेम भरा था
उसे कभी वापस न पाओगे
यार बड़े पछताओगे।

सब छोड़ यार तुम जब मयख़ाने में जाओगे
दो बूंद-दो बोतल से सारे गम जिस दिन धुल आओगे
यार बड़े पछताओगे।

फिर भी अपनों के बिन,तुम कहाँ तक चल पाओगे
चलो मान लिया,तुम दूर तलक चले जाओगे
पर वह वक़्त कहाँ से लाओगे
जो बीत गया उसे कभी वापस न ला पाओगें,
यार बड़े पछताओगे ।
यार बड़े पछताओगे।।

जब उम्र की सीढ़ी पर चढ़ तुम,
आगे निकल जाओगे
शानो-शौक़त और शोहरत के दिनों में ,
ये सब कुछ भूल जाओगें 
लेकिन जब गांव की मिट्टी 
माँ की सोंधी रोटी याद तुमको आयेगी।
तो वह वक़्त कहाँ से लाओगे
जो बीत गया उसे कभी,वापस न ला पाओगे
यार बड़े पछताओगे
यार बड़े पछताओगे

जब उम्र की सीमा पर चढ़ तुम,
जिस वक़्त मौत को गले लगाओगे,
इन ग़मों के सागर में तुम डूब कर क्या ,जो बीत गया उसे कभी वापस ला पाओगें
यार बड़े पछताओगे
यार बड़े पछताओगे।...




गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

बोरसी की आग

 बोरसी नाम सुना-सुना लग रहा होगा। शहरों में बस चुके जिन लोगों की जड़े गाँवों में हैं उन्हें पता होगा ।
उन्हें जाड़े की रातों में बोरसी की आग की स्मृतियां भूली नहीं होंगी । घर के दरवाजे पर या दालान(बरामदा) में बोरसी का मतलब सम्पूर्ण सुरक्षा ।
अब शहरों या गाँवों में भी पक्के, सुंदर घरों वाले लोग धुंए से घर की दीवारें काली पड़ जाने के डर से बोरसी नहीं सुलगाते, उसकी जगह रूम हीटर ने ले ली।
लेकिन गांव के मिट्टी या खपरैल मकानों में ऐसा कोई डर नहीं होता था।
बुजुर्ग कहते थे, दरवाजे पर अगर बोरसी की आग हो तो ठंड ही नहीं भागती बल्कि घर में साँप बिच्छु और भूत-प्रेत का प्रवेश भी बंद हो जाता है।
सार्वजनिक जगहों पर जलने वाले अलाव जहाँ गांव-टोले के चौपाल होते थे, तो बोरसी को पारिवारिक चौपाल का दर्जा हासिल था घर की बड़ी से बड़ी समस्या भी इस पारिवारिक चौपाल के इर्द-गिर्द सुलझ जाती थी
बिस्तर पर जाते समय बोरसी की आग बुजुर्गों या बच्चों के बिस्तरों के पास रख दी जाती थी।
आज के युवाओं और बच्चों के पास बोरसी की यादें भी नहीं हैं जिन लोगों ने बोरसी की गर्मी और रूमान महसूस किया है, उनके पास घर की डिजाइनर दीवारों और छतों के नीचे बोरसी की आग सुलगाने की आजादी अब नहीं रही।

गुरुवार, 27 मई 2021

कोरोना महामारी

क्या कहूँ और कैसे ? कुछ समझ नहीं आ रहा।
इतना भयावह निर्मम और क्रूर मंजर शायद किसी ने कभी सोचा भी नहीं होगा। 
इस महामारी ने स्प्ष्ट कर दिया कि हम दुर्दशा  के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ जन-धन-बल सब बेकार हो चुका है।
हम सभी का दुर्भाग्य तो देखिए हम यह भी नहीं जानते है, कि इस क्रूर बला से मुक्ति कब मिलेगी, विशेषज्ञ तो यह बता रहे है कि यह दूसरी लहर का प्रकोप है तीसरी और चौथी अभी आनी बाक़ी है।
अब कोई सवाल भी नहीं बचा किसी महाशय से पूछने
 को , और इसके जिम्मेदार वहीं लोग है जो यह जानते थे कि दूसरी लहर आने वाली है लेकिन उन्हें क्या ?
क्योंकि लोगों के चिताओं पर इनकी दाल अच्छी पकती हैं।
यह दोष किसी एक का नहीं हमने भी अपनी जिम्मेदारियां नही निभाई और सरकार ने भी अपनी लापरवाही में कोई कसर तक नहीं छोड़ी।
सरकार तो बस चुनाव कराने में व्यस्त थी और हाँ चुनाव का एक ही लाभ मिला देश को चिताओं की संख्या में वृद्धि, और इस क्रूर महामारी ने अपने पाँव पूरी तरह फैल लिए।
लेकिन सरकार को क्या उनके पास तो आंकड़े मौजूद है और आंकड़े सिर्फ और सिर्फ दर्द को बढ़ाते है किसी का पिता, किसी का बेटा, किसी की माँ, को तो वापस नहीं ला सकते हैं। और ये आंकड़े कितने सही और कितने  गलत हैं ये सभी को पता है।
अब हमारे, आपके, और हम सभी के पास विकल्प बस यही बचा है कि इस महामारी से खुद व अपनों को सुरक्षित रखें और लोगों की हरसंभव मदद करें, जागरूक करें।
तो घबराएं नहीं बस सावधान रहें।    
                                                  धन्यवाद🙏






रविवार, 4 अगस्त 2019

दोस्तों के नाम

सोचा आज कुछ दोस्तों के लिए भी हो जाये।
एक बड़ा ही प्रचलित सवांद याद आ रहा है कि " जब बेटा बड़ा हो जाये तो पिता को उसे अपना बेटा नहीं बल्कि दोस्त समझना चाहिये"।
दोस्ती का तमाम मानवीय रिश्तों के बीच एक अलग मुकाम है। यह भरोसे से पैदा होती है और आप में भरोसा पैदा करती है कि आप अकेले नहीं हैं।
यह अहसास साथ रहता है कि कोई तो है, जिससे बेहिचक अपने सुख-दुख साझा कर सकते है।
यह एक ऐसा रिश्ता है,जो इंसान खुद बनाता है।
बाकी सारे रिस्ते तो बने बनाये मिलते हैं। दोस्ती और दोस्त उम्र के पहले पड़ाव पर ही जीवन मे शामिल हो जाते हैं
चाहे वो बचपन के टिफिन बांट कर खाने वाले दोस्त हों या आम के पेड़ पर निशाना लगाने वाले, होमवर्क आधा छूट जाने पर अपनी कॉपी देने वाले हों या चुगली करने वाले सभी ने इन पलों को हमेशा के लिए यादगार बन दिया। दोस्ती पर  जितना भी लिखा जाए उतना ही कम है, अंत मे वसीम बरेलवी की एक पंक्ति है कि-
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ,
कीजे मुझे कुबूल मिरी हर कमी के साथ।



रविवार, 26 मई 2019

मुमकिन है

                         मुमकिन है
मेरे पहले पंक्ति से ही आप लोगों को पता चल गया होगा कि यहाँ बात वर्तमान लोकतंत्र के सबसे बड़े विजेता की हो रही है।
भरोसा। शायद यही उपयुक्त शब्द होगा जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान देश के नागरिकों के मन और दिल में जगाया।
 देश के दुश्मनों की आँख में आँख डालकर बात करने की बात हो,या राष्ट्रीय सुरक्षा की बात हो या उज्वला और आयुष्मान जैसी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने की बात हो।
सरकार की कार्यशैली और आत्मविश्वास ने लोगों में यह भरोसा पैदा किया कि नामुमकिन कुछ भी नहीं। हर मोर्चे पर सरकार की साफगोई और निष्ठा ने लोगों का दिल जीत लिया,सब कुछ अच्छा हुआ और जो नहीं हुआ उसके लिए महज पांच साल की समयावधि के तर्क को कुतर्क तो कतई नहीं कहा जा सकता है।
तभी तो लोगों ने इस समयावधि को और बढ़ा दिया है। न सिर्फ बढ़ाया बल्कि इस लायक बनाया कि खुद के विवेक से सरकार सख्त से सख्त फैसले से भी न परहेज करें।,अब जनता को यह लग रहा हैं,कि नामुमकिन कुछ भी नहीं।
क्योंकि अब जनता ही बोलने लगी है,मोदी है तो मुमकिन है। ऐसे में नई सरकार के सामने विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी चुनौतियों और उनके समाधान आज बड़ा मुद्दा है। इस जीत पर अटल जी की कुछ पंक्ति:
हार नहीं मानूगा,रार नहीं ठानूगा,
काल के कपाल पे लिखता और मिटाता हूँ,
मैं गीत नया गाता हूँ।

रविवार, 19 मई 2019

देश के लिए जरुरी।

                     देश के लिए जरूरी
                      (आपका एक मत)
देश इस महापर्व के अंतिम चरण में पहुँच गया हैं और आज इस लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व की विदाई हैं साथ ही साथ कुछ ही दिनों में इसके परिणाम भी आ जायेंगे।
परंतु मैं उन युवाओं में से हूँ जो चिंतित भी है और उत्साहित भी,क्योंकि हम पहली बार मतदान करने जा रहे हैं। 
चिंता इस बात की है,की हम कहाँ अपने मताधिकार का प्रयोग करें,और उस से भी बड़ी चिंता यह कि क्या मताधिकार का प्रयोग करने के बाद भी हमारे मत का सही मूल्य मिल पायेगा देखते है।?
देश के विकास में जात-पात,लालच और सभी प्रकार के मतभेदों को दरकिनार करते हुए,एक सभ्य नागरिक होने के नाते अपना वोट जरूर दें।                                                                        धन्यवाद 

रविवार, 12 मई 2019

माँ है तो मुमकिन है।

               माँ है तो मुमकिन है।
माँ है तो कुछ भी मुमकिन है,क्योंकि दुनिया के किसी छाव में उतना सुकून नहीं जितना माँ के आँचल में है। दुनिया में ऐसा कोई बिस्तर नहीं जो माँ के गोद से भी बढ़िया नींद ला दे,दुनिया मे ऐसा कोई नहीं जो माँ-बाप का स्थान ले सकें। तो माँ-बाप के बिना इस सृष्टि की रचना अधूरी है।
जहाँ पिता अपने गुस्से से ही प्रेम को दिखाता है वहीं माँ अपने आँचल में छुपाकर उस प्रेम को दुगुना कर देती है, 
दुनिया में शायद ही किसी ने इनके इतना तपस्या किया हो,इतिहास में तो बहुत महान योद्धा मिल जायेंगे परंतु वर्तमान में माँ-बाप के इतना महान योद्धा कहीं नही मिलेगा।क्योंकि अपने बेटे/बेटी के लिए हर जंग लड़ने को तैयार रहते हैं।
कुछ पक्तियां हैं,मैं पढ़ता हूँ मुझे अच्छी लगती है-
बहुत रोते है लेकिन दामन हमारा नम नहीं होता,
इन आँखों के बरसने का कोई मौसम नहीं होता,
मैं अपने दुश्मनों के बीच भी महफूज़ रहता हूँ,
मेरी माँ की दुआओं का खजाना कम नहीं होता।


गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

सुर्खियों में किसान

               सुर्खियों में किसान।                      किसान उगाता है,तो देश खाता है ये तो सिर्फ अब     कहने की बात हो गई पर क्या जब कोई किसान मरता है तो देश जानता है। जवाब आप लोंग ख़ुद जानते हैं 
और जब एक किसान मरता है तो न ही यह समाचार पत्रों की मुख्य ख़बर होती है और न ही सोशल मीडिया पर इसे देखा जाता है किसान के साथ ही ये ख़बर भी दम तोड़ देती है। और अगर कहीं किसान की ख़बर मिलती भी है तो संपादकीय पृष्ठ पर या कहीं कोने में।
लेकिन वही जब कोई लोकतांत्रिक पार्टी को विजयश्री प्राप्त होती है या किसी नामजद की जेल यात्रा तो पूरा देश इन्हीं खबरों से पट जाता है।
बड़े दुःख की बात है कि 'जो उगाता है वही हर बार क्यो मार खाता है' क्या यही उसकी सजा है।
यहाँ मैं एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ कि न मैं किसी राजनीतिक पार्टी से हूँ ,और न ही किसी किसान मोर्चा दल से, मैं तो उस किसान का बेटा हूँ जो अपना सारा दिन अपनी फसलों को अच्छा करने में लगा देता है और रात में इस डर से नहीं सोता की उसकी फसल बर्बाद न हो जाए, नहीं तो बैंक का कर्ज़ व बेटे की पढ़ाई और पत्नी की दवाई सब रुक जाएगी। और अगर फसले अच्छी हो भी जाये तो क्या बाजार में अच्छे दाम मिल जाएंगे और अगर नहीं मिले तो फिर क्या?
इन्हीं बातों को सोचते हुए उसकी हर सुबह होती है,और खेत फिर उसे अपने बेटे की तरह प्यारे लगने लगते है। और वह पुनः इन्हीं चिताओं में घिरा रहता है कि कही बेटे-बेटी की पढ़ाई न रुक जाए,कहि पत्नी की दवाई न रुक जाए,और अंत में होता क्या है उसकी साँसे ख़ुद ही रुक जाती है।
तब पता चलता है कि बैंक का कर्ज न चुकाने व बाजार में फसल के औने-पौने दाम मिलने से एक और किसान का परिवार व पूरा देश पुनः अनाथ हो गया।
                                                      धन्यवाद।

बुधवार, 7 नवंबर 2018

Diwali


बस का इंतज़ार करते हुए,
मेट्रो में खड़े-खड़े
रिक्शा में बैठें हुए
गहरे शून्य में क्या देखते रहते हों?
गुम सा चेहरा लिए क्या सोचते रहते हो?
क्या खोया और क्या पाया का हिसाब नहीं लगा पाये ना इस बार भी?
घर नहीं जा पाए ना इस बार भी?
                                           धन्यवाद

रविवार, 16 सितंबर 2018

साथी हाथ बढ़ाना।



साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना साथी हाथ बढ़ाना.........
इन पंक्तियों में एक प्रकार की एकता स्पष्ट झलकती दिखती है चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो।
मैं बात स्वच्छता की कर रहा हूं ।
इस से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं किसी भी राजनीतिक दल से नहीं हूं और अब आगे........
मैं पहले तो उस व्यक्ति विशेष को धन्यवाद देना चाहता हूं जिसने इस अभियान को देशव्यापी बनाया और तो और यह बात किसी एक व्यक्ति के लाभ व स्वार्थ के लिए नही बल्कि पूरे देश के स्वास्थ और जीवन को बेहतर बनाने की लिए की जा रही है।
आज से ही मुझे,आपको, बल्कि हम सभी को मिलकर सिर्फ अपने आस-पास के इलाके को स्वच्छ करना होगा, और दूसरों को भी जागृत करना होगा।
जैसा कि मेरी पहली पंक्ति में ही यह स्पष्ट है कि सबको एक साथ आना होगा तभी हम परिणाम को भी बखूबी देख पाएंगे।
इस विषय पर जितना भी लिखे कम ही है क्योंकि बात लिखने से नही करने से बनेंगी।
इसलिए सिर्फ एक अपील भारत का एक नागरिक होने के नाते,भारत को स्वच्छ बनाने के लिए,
मुझे विश्वास है,की आप लोग इस संदेश को अन्य लोगों तक पहुचायेंगे और स्वच्छता से जुड़े अपने अनुभव व चित्र फेसबुक व व्हाट्सएप पर सबके साथ साझा करेंगे।
            धन्यवाद

रविवार, 13 मई 2018

माँ


आज का विषय माँ है, जिस पर मैं कुछ निवेदित कर रहा हूँ जब समूचा ब्रह्मांड उद्घोष करता है तो माँ जन्म लेती है यह वो स्त्री है, जो समय के साथ बदलती है बदलती ही नहीं वरन समय को बखूबी थाम भी लेती है।
माँ जब अपने झुर्रियों भरे हाथों से आशीर्वाद देती है तो सफलता के नये मापदंड और प्रतिरूप तय हो जाते हैं।
मुझे नहीं पता कि किनकि माँ जिवित हैं और किन्होंने माँ को खो दिया है पर मेरा व्यक्तिगत मत है कि जिनकी माँ जिवित हैं जिनके पिता जिवित हैं वो दुनिया के सबसे सम्पन्न लोग हैं, वो दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं।
एक मिनट बचपन में लौटियेगा जब हम बहुत छोटे थे जब माँ की गोद में थे तब हम माँ का स्तनपान करते थे और उसी समय अपने नन्हें-नन्हें पैरों से माँ को मारा करते थे पर उस माँ ने हमें कभी भी दूध पिलाना बंद नहीं किया।
मित्रों लात खाकर भी अगर भोजन देने की शक्ति उस परम पिता परमेश्वर ने किसी को दी है तो वो हैं माँ
पृथ्वी पर मनुष्य भगवान को ढूँढ़ता है और न जाने क्यों मेरा मानना है कि भगवान का ही रूप है माँ जिसको बोलने में ही ममता का भाव स्पष्ट सुनाई देता हैं।
माँ शब्द सुनते ही ज़ेहन में एक अलग आनंद की अनुभूति होती है और आज भी वो एक फ़िल्मी डायलॉग जो शायद किसी को न भूला हो 'मेरे पास माँ है'। सुनते ही हृदय में एक ममता का अविरल भाव उतपन्न हो जाता है। 
           

बहुत रोते हैं लेकिन दामन हमारा नम नही होता,
इन आँखों के बरसने का कोई मौसम नहीं होता,
मैं अपने दुश्मनों के बीच भी महफ़ूज रहता हूँ,
मेरी माँ की दुआओ का खजाना कम नहीं होता।

माँ जिसमें संवेदना है, भावना है, त्याग है, ममता है, प्यार है, पवित्रता है और यूँ कहें तो संसार के सारे गुण विद्यमान है।
माँ अपने लिये नहीं अपनों के लिए जीती है।
पुनः एक बार बचपन में लौटियेगा जब परीक्षा देते जाते समय दही का कटोरा ले हमारे सामने शगुन बन खड़ी हो जाती वो माँ ही हैं।
हर परिस्थितियो में ढाल बनकर खड़ी होने वाली वो माँ ही हैं,
यहाँ तक कि पापा के मार से बचाने वाली वो माँ ही हैं।
धूप में अपने आँचल का छाव देने वाली वो.........

गीता, क़ुरान और बाइबल का सार है माँ
दुनिया और संसार है माँ...............

                                        ऐसी हर माँ को शत-शत नमन....

शनिवार, 17 मार्च 2018

समाज मे बेटियों की स्थिति

                 समाज में बेटियों की स्थिति

               

आज हम बात बेटियों की स्थिति के विषय पर करने जा रहे हैं। सरकारी वादों व तमाम समाज सेवी संस्थाओं ने बेटियों के प्रति प्रोत्साहन में कोई कमी नहीं छोड़ी, पर कई क्षेत्रों में तो बेटियाँ उच्च शिखर पर हैं और कहीं तो इस समाज के कुंठित सोच के दलदल में फँसकर और फँसती जा रही हैं।
सरकार के तमाम वादे तो बहुत ही सजग व सही दिशा में हैं।
परन्तु सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी इस पुरुष प्रधान देश मे कहीं तो बेटियों की स्थिति खिलते फूल के समान हैं तो कहीं सूखे पत्ते से भी बत्तर, जिसे अपने समाज में शिक्षा से भी वंचित रखा जाता है।
आज भी कई राज्यों में लिंगानुपात में कहीं ज़्यादा बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, पर यहाँ हम शासन को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते, क्योंकि शासन तो सिर्फ़ प्रोत्साहित करेगी, पर सोचना और शासन के कार्यों को मूर्त रूप देना तो जनता की सोच पर निर्भर करता है।.



                    लक्ष्मी का वरदान है बेटी,
                   धरती पर भगवान है बेटी।

हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने तो यह ठान लिया है कि हम बेटियों की स्थिति बेहतर करेंगे, पर क्या वह कम लिंगानुपात वाले राज्यों में उन घरों के लोगों तक अपनी इस बात को पहुँचा पाएँगे, जिन्हें तो सिर्फ़ बेटों की भूख है ज़रा यह भी तो सोचो कि "बेटी नहीं बचाओगे,तो बहु कहाँ से लाओगे"।

चिंता का विषय

आज भी ग्रामीण इलाकों की बेटियों में शिक्षा का आभाव देखने को मिल रहा है, किसी-किसी प्रकार से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई कराके इन्हें घर के कामों में लगा दिया जाता है, या फिर इनका विवाह कर दिया जाता है।
बड़ी मुश्किल से आज कोई अभिभावक अपनी बेटी को शिक्षा के लिए घर से दूर भेज देता है, तो गाँव घर के तानों से भी नहीं बचता, पर यही कुछ लोगों की नज़रों
में तो बेटियाँ अभिशाप हैं और उनकी राय यही होती है कि "जननी को जननी के गर्भ में ही मार दो"क्योंकि 'ना रहेगा बाँस, और ना बजेगी बाँसुरी'।
लोग ये क्यों भूल जाते हैं, कि वे भी किसी जननी की ही देन हैं।
तुम्हारी माँ, पत्नी, बेटी, बहन, बहू, आदि, ये सभी बेटियाँ ही तो हैं।
प्रयास तो जारी है पर समस्या यह है, कि समाज में जब तक ये कुंठित सोच वाले लोग रहेंगे, तब तक अपनी गंदी सोच समाज मे बिखेरते रहेंगे। किसी ने सही कहा है कि अभी सौ सालों तक कुछ बदलने वाला नहीं है और ये सुधरने वाले लोग नहीं हैं।
जरा सोचिए कुछ राज्यों में तो महिलाए ही भ्रुण हत्या का समर्थन करती हैं, ये कैसी महिलाएँ हैं, सोच कर ही मन विचलित हो जाता है।

बेटी बचाओ और जीवन सजाओ,
                          बेटी पढ़ाओ और ख़ुशहाली बढ़ाओ।


शिक्षा के क्षेत्र में

शिक्षा के क्षेत्र में बेटियों की सफ़लता की कहानी लिखना शुरू करूँ तो स्याही कम पड़ जाए। चाहें वह शिक्षा, खेल या अंतरिक्ष की बात हो।
 पर आज भी ग्रामीण इलाकों का हाल वही है, स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है पर ज्यादा कहना गलत होगा।
ज्यादा से ज्यादा हाईस्कूल व इंटरमीडिएट तक पढ़ा कर इन्हें घर के कामों में लगा दिया जाता है, जो लोग यहाँ पढ़ाने में सक्षम हैं उनका भी हाल यही है।
जो लड़कियाँ कुछ करने के लिये अपने कदम बढ़ाती हैं तो कुछ अभिभावक ही उनके रास्ते का रोड़ा बन जाते हैं।

बेटियों को पढ़ाओगे,
             तो
                 इज्जत मुफ्त में पाओगे



देवी मत मानो बस दे दो सम्मान

यह हमारे समाज का दोहरा रवैया नहीं तो और क्या है कि एक तरफ बड़ी-बड़ी बातें तो दूसरी तरफ उसे गर्भ में ही मार दो।
बेटियों को देवी मानने या कन्या खिलाने का जो रिवाज़ है वह अपनी जगह है, लेकिन बेटियाँ ही शक्ति हैं। यदि मानते हैं तो उनका हक क्यों नही देते,उन्हें जन्म क्यों नहीं लेने देते?
सच है कि नवरात्र के दौरान देवी भक्ति में डूबे बहुत से लोग बस रस्मों को निभाने में तेजी दिखाते हैं, लेकिन यथार्थ से काफी दूर हैं। लोग रात-रात भर जागरण में देवी का गुणगान करते हैं, पर वास्तविकता यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा नहीं चाहता कि कन्या रूपी ये देवियांँ उनके यहाँ जन्म लें। पाप-पुण्य के सवालों से जूझता समाज इसे पाप क्यों नहीं मानता? इसे मानवीयता के लिहाज़ से देखने की बात तो दूर इसका सामाजिक दुष्प्रभाव क्या होगा शायद इसका भी ज्ञान नहीं।